ग्रामीण तहकीकात/ संपादक नवीन कुमार
मंगलौर। आगामी विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही मंगलौर की राजनीति में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है, जहाँ हरियाणा के पूर्व मंत्री करतार सिंह भड़ाना द्वारा आयोजित की जा रही ‘घोषणाओं वाली बैठकों‘ को लेकर स्थानीय पत्रकारों में भारी रोष व्याप्त है। क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि भड़ाना अपनी बैठकों में केवल बाहर से आए अपने ‘चहेते‘ पत्रकारों को ही बुलाते हैं, ताकि उनकी मनमाफिक ब्रांडिंग और तारीफें करवाई जा सकें, जबकि मंगलौर के स्थानीय मीडियाकर्मियों को इन कार्यक्रमों की भनक तक नहीं लगने दी जाती। स्थानीय लोगों और पत्रकारों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है जो जमीनी हकीकत से वाकिफ स्थानीय पत्रकारों को इन बैठकों से दूर रखा जा रहा है? जानकारों का मानना है कि शायद बाहरी नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि स्थानीय पत्रकार क्षेत्र की असल समस्याओं और जनता के कड़वे सवालों को सामने रख देंगे, जिससे उनकी ‘हवाई घोषणाओं‘ की पोल खुल सकती है। बाहर से बुलाए गए पत्रकारों के जरिए अपनी छवि चमकाने की यह कोशिश मंगलौर की जागरूक जनता और यहाँ के निष्पक्ष मीडिया जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों और पारदर्शी राजनीति पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
लोकतंत्र का गला घोंटने वाली ‘चुनिंदा’ पत्रकारिता आखिर क्यों?
मंगलौर की राजनीति में इन दिनों एक अजीब और खतरनाक परंपरा सिर उठा रही है। जब जनता के बीच जाने वाले नेता खुद को ‘सवालों’ से बचाने के लिए ‘पसंद के कलमकारों’ की ढाल बनाने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि दाल में कुछ काला है। हरियाणा के पूर्व मंत्री करतार सिंह भड़ाना द्वारा अपनी घोषणाओं वाली बैठकों से स्थानीय पत्रकारों को दूर रखना और केवल बाहर से आए अपने खास लोगों से ‘तारीफें’ करवाना, न केवल पत्रकारिता का अपमान है बल्कि मंगलौर की जागरूक जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
स्थानीय पत्रकार इस मिट्टी की समस्याओं, यहां की टूटी सड़कों और बेरोजगार युवाओं के दर्द को समझते हैं। शायद यही वजह है कि ‘पैराशूट नेताओं’ को स्थानीय मीडिया के तीखे सवालों से डर लगता है। बाहर से बुलाए गए पत्रकारों के जरिए अपनी छवि चमकाना आसान हो सकता है, लेकिन मंगलौर की जमीन पर उतरकर सच का सामना करना ही असली राजनीति है। ‘ग्रामीण तहकीकात’ और हमारा पूरा पत्रकार जगत ऐसी किसी भी कोशिश की कड़े शब्दों में निंदा करता है जो प्रेस की आजादी और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के रास्ते में रोड़ा अटकाती है। जनता सब देख रही है और वक्त आने पर वह इन ‘हवाई’ तारीफों और जमीनी हकीकत का अंतर साफ कर देगी।