ग्रामीण तहकीकात
मंगलौर। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन मंगलौर की सियासी जमीन अभी से तपने लगी है। इस बार मुकाबला किसी पार्टी से ज्यादा ‘अपने और पराए’ के बीच खिंचता नजर आ रहा है। मंगलौर की गलियों और चौपालों में अब एक ही सवाल गूंज रहा है— क्या भाजपा जैसी बड़ी पार्टी के पास इस इलाके में अपना कोई मजबूत स्थानीय चेहरा नहीं बचा है?
हवा तब और गरम हो गई जब खुद भाजपा जिला अध्यक्ष मधु सिंह ने मीडिया के सामने यह माना कि मंगलौर एक मुस्लिम बाहुल्य इलाका है और यहाँ स्थानीय नेताओं का अपना एक अलग ही दबदबा रहता है। उनके इस बयान के बाद इलाके के कार्यकर्ताओं और आम लोगों के बीच चर्चा और तेज हो गई है। खासकर हरियाणा से आए पूर्व मंत्री करतार सिंह भड़ाना को लेकर क्षेत्र में फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है।
क्षेत्र की जनता का साफ कहना है कि उन्हें ऐसा नेता चाहिए जो उनके सुख-दुख में साथ खड़ा हो, जो यहाँ की गलियों और समस्याओं से वाकिफ हो। लोगों के बीच चर्चा है कि हरियाणा जैसे दूसरे राज्यों से नेताओं को लाकर चुनाव लड़ाना न सिर्फ जनता के साथ नाइंसाफी है, बल्कि उन स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ भी धोखा है जो सालों से जमीन पर पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे हैं। जब किसी ‘पैराशूट प्रत्याशी’ को टिकट मिलता है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट जाता है और वे खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगते हैं।
राजनीतिक जानकारों के बीच भी यह चर्चा है कि आखिर पार्टी बार-बार बाहरी चेहरों पर दांव क्यों लगा रही है? क्या मंगलौर भाजपा में वाकई स्थानीय लीडरशिप खत्म हो चुकी है? या फिर संगठन अपने ही कर्मठ कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं कर पा रहा? स्थानीय लोगों का तर्क है कि बाहरी प्रत्याशी चुनाव के बाद अक्सर क्षेत्र से दूरी बना लेते हैं, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं।
अब देखना यह होगा कि 2027 के दंगल में भाजपा आलाकमान जनता की इस मांग को सुनता है या फिर एक बार फिर किसी बाहरी चेहरे को उतारकर अपनों के ही विरोध का रिस्क लेता है। मंगलौर की जनता इस बार आर-पार के मूड में दिख रही है।
“अब यह तो वक्त ही बताएगा कि भाजपा आलाकमान जनभावनाओं को तरजीह देता है या अपने पुराने सियासी समीकरणों पर अडिग रहता है।”